Dawa Chal Rahi Hai | Old Age Poem | Hindi Kavita

इक मोड़ पर आकर के
ज़िन्दगी ठहर गयी है
सब कुछ तो रुक गया है
बस दवा चल रही है…।

अब एक दर्द हो तो
मैं उससे पार पाऊँ
किसकी व्यथा कहूँ मैं
किसको बड़ा बताऊँ

नासूर वाली पट्टी
फिरसे बदल रही है
सब कुछ तो रुक गया है
बस दवा चल रही है…।

पैरों की तेज गति पर
विराम लग गया है
लाठी हाथ में, नाक
चश्मा चढ़ गया है

बिन बात के ही देखो
अंगुली भी हिल रही है
सब कुछ तो रुक गया है
बस दवा चल रही है…।

खाने के नाम पर भी
क्या ही बचा हुआ है
चिकना या तीखा ठण्डा
सब कुछ मना हुआ है

जो आस कुछ बची है
वो भी फिसल रही है
सब कुछ तो रुक गया है
बस दवा चल रही है…।

कह कह के हाल अपना
सबको बता रहे हैं
अंदर तो जल चुके हैं
पर मुस्कुरा रहे हैं

हमको बुला रही है
जो आग जल रही है
सब कुछ तो रुक गया है
बस दवा चल रही है…।

अब खाट पर से उठना
मुश्किल से हो रहा है
पैरों के सूखे तलवे
जीवन भिगो रहा है

हरि नाम के सहारे
यह उम्र ढल रही है
सब कुछ तो रुक गया है
बस दवा चल रही है…।

इस देह की ये अकडन
कभी घटती कभी बढ़ती
घुटने जवाब देते
जब उम्र सीढ़ी चढ़ती

आँखों के सामने ही
मृत्यु टहल रही है
सब कुछ तो रुक गया है
बस दवा चल रही है…।

पराग पल्लव सिंह

Behind the Poem:
I was sitting around my mother. She called to me get her medicine. I did the same as dictated. I went into the room and found some two three meds and handed over to her. After taking the meds, she suddenly said in low voice , ” जाने और कितने दिन दवा चलेगी !”
This line striked me and I started penning down my thouhts on the line. In this way this hindi poem, “Dawa Chal Rahi Hai..” came into existence.


Chalte Chalte:
My mother has always been an inspiration behind many of my poems. I have written several poems on her. I know how much I miss her when I am away from my mother.

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