Bacchon Ke Beech | Hindi Poem on Children

आज, रोज़ वाले रास्ते छोड़,
बच्चों के बीच चला गया मैं।
इस बात की खुशी है मुझे,
लगा कि वहां भला गया मैं।

नई शक्ल देख वो बच्चे,
थोड़ा डर रहे थे मुझसे।
कुछ तो पास आ रहे थे,
कुछ दूर जा रहे थे मुझसे।

धीरे धीरे डर जाता रहा,
उनसे दोस्ती सी हो गई।
छोटी सी बच्ची “आसा” तो,
जैसे देखकर ही खुश हो गई।

वक्त आगे बढ़ता रहा और,
“इंट्रोकड़सन” भी चलता रहा।
जिस बच्चे का होता गया,
बस वो वो आगे बढ़ता रहा।

“साहिल” की तरफ देखा तो,
वो खिलखिलाकर हंस दिया।
नन्हे नन्हे हाथों ने मुझे,
चारों ओर से कस लिया।

जान बचाने की मुझको,
कोई तरकीब सूझ न आयी।
फिर तभी मेरे बचपन की,
“इमली” ने जान बचाई।

फिर धीरे धीरे शुरू किया,
बच्चों का ये “क्लासी” खेल।
डब्बा डब्बा जोड़ जोड़ कर
एक बनी बच्चों की रेल।

कुछ डब्बे तो छोटे थे,
कुछ लंबे थे कुछ मोटे थे।
खेल के नियम पता नहीं,
पर कूद कूद खुश होते थे।

मेरे अंदर का बच्चा भी इन,
बच्चों के संग जाग गया।
कदम तले इन बच्चों के,
अपने बचपन में भाग गया।

यूं खेल खेल में शाम हुई,
और बच्चे लौटे अपने घर।
चेहरे पर मुस्कान लिए फिर,
मैं भी पहुंचा अपने घर।

आकर सोचा तन्हाई में,
मन को अकेला छोड़ दिया
कैसे इन छोटे बच्चों ने,
मुझको बचपन से जोड़ दिया
.
( इमली : जो खेल ये बच्चे खेल रहे हैं, उसे मेरे गांव में इसी नाम से जाना जाता है।)

©पराग पल्लव सिंह

Behind this Poem:
I wrote “Bachcho Ke Beech” poem while playing with some Kids of the hardworking laborers in my college. This poem is very close to my heart. To check a beautiful video of “Bachcho Ke Beech”, Kindly Check the IGTV Video here.

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